चंद्रपुर की पहचान रही पुरानी सिनेमा टॉकीज। !

बल्लारपुर (ब्यूरो) : चंद्रपुर की पहचान रही पुरानी सिनेमा टॉकीज अब धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही हैं। जयंत टॉकीज को तोड़कर वहां मॉल बनाया जा रहा है, सपना टॉकीज भी अब टूट रही है, श्रीकृष्ण टॉकीज कई वर्षों से बंद पड़ी है और श्री टॉकीज भी अब अस्तित्व में नहीं रही। इस सिलसिले की शुरुआत विजय टॉकीज से हुई, जो सबसे पहले गिराई गई। इस तरह चंद्रपुर की पांच प्रमुख टॉकीज खत्म हो चुकी हैं। अब केवल अभय, राजकला और राधाकृष्ण टॉकीज ही शेष हैं। मॉल में बने मल्टीप्लेक्स थिएटर वह एहसास नहीं दे पाते, जो पुराने सिंगल स्क्रीन टॉकीज में मिलता था।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है। दुनिया बदली, सिनेमा बदला और टॉकीज भी धीरे-धीरे जर्जर होकर खत्म होती गईं। एक समय था जब किसी के पास अपनी सिनेमा टॉकीज होना प्रतिष्ठा की बात मानी जाती थी। सिनेमा का टिकट लेना भी एक अलग ही गर्व और उत्साह का प्रतीक होता था। टिकट ब्लैक में बिकती थीं, और “फर्स्ट डे फर्स्ट शो” देखने का जुनून कई लोगों के लिए एक अलग ही नशा था। फिल्म देखकर आने के बाद उसकी कहानी सुनाने के लिए दोस्त और परिचित खुद ही आपके आसपास इकट्ठा हो जाते थे।
जयंत टॉकीज में फिल्म देखना अपने आप में एक गौरव की बात होती थी। वहां की अपनी एक अलग शान थी। फिल्म शुरू होने से पहले रोशनी से सजा पर्दा ऊपर उठता था, जिसे देखना भी अपने आप में रोमांचक होता था। रविवार सुबह 10 बजे जयंत टॉकीज में अंग्रेजी फिल्में लगती थीं, जिन्हें देखना गर्व की बात मानी जाती थी। वहीं पर पहली बार जैकी चान, ब्रूस ली, सिल्वेस्टर स्टैलोन, ब्रूस विलिस, रोजर मूर और अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर की फिल्में देखीं। “ब्लू लगून”, “टॉवरिंग इन्फर्नो”, “एंटर द ड्रैगन”, “फ्रेंच कनेक्शन”, “गोल्ड रश”, “रैंबो” और “ऑक्टोपसी” जैसी फिल्में वहीं देखी गईं। लॉरेल-हार्डी और चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों से भी वहीं मुलाकात हुई, और जेम्स बॉन्ड से मिलने के लिए भी जयंत टॉकीज ही जाना पड़ता था। फिल्म देखने के बाद कई दिनों तक मन उसी दुनिया में खोया रहता था।
विजय टॉकीज की अपनी अलग पहचान थी। वहां पुराने ब्लैक-एंड-व्हाइट फिल्में भी लगती थीं और कुछ ऐसी फिल्में भी, जिन्हें देखने लोग चुपचाप जाया करते थे। वहां आने वाले लोग एक-दूसरे को देखकर भी अनदेखा कर देते थे। यह टॉकीज युवाओं के जीवन के खास पड़ाव की भी गवाह रही, जहां कई प्रेम कहानियों की शुरुआत और आगे बढ़ने के पल देखे गए। बाद में युवाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए “बॉक्स” नाम की विशेष सीट व्यवस्था शुरू हुई, जो जयंत, राजकला और अभय टॉकीज में उपलब्ध थी, और राजकला का बॉक्स तो खास तौर पर चर्चित था।
कई ऐतिहासिक फिल्में और उनसे जुड़ी यादें आज भी आंखों के सामने ताजा हैं। जयंत टॉकीज में “कुर्बानी” सुबह 6 से 9 बजे के विशेष शो में लगी थी, और “एक दूजे के लिए” के समय भारी भीड़ उमड़ी थी। टिकट खिड़की पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए बाउंसर तक तैनात किए गए थे। “शोले” और “लैला मजनू” श्री टॉकीज में लगी थीं। जब “हुस्न हाज़िर है मोहब्बत की सजा पाने को…” गीत बजता था, तो दर्शक खुशी में पर्दे पर सिक्के उछालते थे। अखबारों में ऐसा न करने की अपील छपती थी, लेकिन लोगों का उत्साह कम नहीं होता था।
श्रीकृष्ण टॉकीज में “जय संतोषी मां” लगी थी, जिसके दौरान महिलाएं हल्दी-कुंकू लेकर आती थीं और टॉकीज में आरती भी होती थी। “माहेरची साड़ी” फिल्म के समय साड़ियां बांटी गई थीं और महिलाओं के लिए विशेष शो आयोजित किए गए थे।
सपना टॉकीज के उद्घाटन के दिन धर्मेंद्र और पूनम ढिल्लों की फिल्म “कयामत” का पहला शो देखने का भी अलग ही अनुभव था। उस दौर में एक ही दिन में चार शो देखने का रिकॉर्ड भी बनाया गया। इन टॉकीज ने हमारे साधारण ब्लैक-एंड-व्हाइट बचपन को रंगीन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार को सुपरस्टार बनाने में दर्शकों का भी बड़ा योगदान रहा। “बेताब”, “कयामत से कयामत तक” और “मैंने प्यार किया” जैसी फिल्मों ने पूरी पीढ़ी के सपनों को आकार दिया।
फिल्म शुरू होने से पहले ही टॉकीज के बाहर खड़े होकर अंदर से आने वाली आवाजों से अंदाजा लग जाता था कि कहानी किस मोड़ पर पहुंची है—हीरो विलेन के अड्डे पर पहुंच चुका है, आखिरी लड़ाई शुरू है और पुलिस आने ही वाली है।
इन टॉकीज में न जाने कितने लोगों के सपने पले-बढ़े और साकार हुए। आज जब ये सभी टॉकीज टूटती और बंद होती नजर आ रही हैं, तो यह एक पूरी पीढ़ी के लिए बेहद भावुक और दर्दनाक क्षण है। ये सिर्फ इमारतें नहीं थीं, बल्कि यादों, सपनों और भावनाओं का एक अनमोल हिस्सा थीं, जो हमेशा दिलों में जीवित रहेंगी।

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