खैरात की राजनीति पर टिका चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव का परिणाम .!

जनता के फैसले पर सवाल, वादों और सुविधाओं की बौछार के बीच असली मुद्दे गायब .!

चंद्रपुर : आगामी चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव अब पूरी तरह से “खैरात की राजनीति” के इर्द-गिर्द सिमटता नजर आ रहा है। विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा चुनावी माहौल में जनता को लुभाने के लिए दी जा रही सुविधाएं, उपहार, वादे और अस्थायी राहत योजनाएं ही इस बार के चुनाव परिणाम की दिशा तय करती दिखाई दे रही हैं। विकास, पारदर्शिता और दीर्घकालीन योजनाओं जैसे मूल मुद्दे कहीं न कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं।
शहर के विभिन्न वार्डों में नेताओं द्वारा रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुएं, आर्थिक सहायता, धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास तेज हो गया है। कहीं मुफ्त राशन का वादा है तो कहीं सड़क, नाली और पानी की अस्थायी मरम्मत को चुनावी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो व्यक्तिगत लाभ से जुड़ी सहायता को भी खुलेआम प्रचार का हिस्सा बनाया जा रहा है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने वाली यह “खैरात नीति” केवल वोट बटोरने का साधन बनकर रह गई है। चुनाव बीतते ही वही समस्याएं—टूटी सड़कें, गंदगी, जलनिकासी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी—फिर से जस की तस रह जाती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस बार का चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि किस दल ने जनता को अधिक प्रभावी तरीके से तात्कालिक लाभ पहुंचाया। मतदाता भी कई बार दीर्घकालीन विकास की बजाय तत्काल मिलने वाली सुविधाओं को प्राथमिकता देते नजर आ रहे हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कुछ जागरूक नागरिक संगठनों ने अपील की है कि मतदाता भावनाओं या लालच में आकर नहीं, बल्कि शहर के समग्र विकास को ध्यान में रखकर मतदान करें। उनका कहना है कि चंद्रपुर जैसे औद्योगिक और सांस्कृतिक महत्व वाले शहर को मजबूत, ईमानदार और दूरदर्शी नेतृत्व की आवश्यकता है, न कि सिर्फ चुनावी खैरात की।
अब देखना यह होगा कि मतदाता इस बार भावनाओं और तात्कालिक लाभ से ऊपर उठकर ठोस विकास के वादों को महत्व देते हैं या फिर खैरात की राजनीति ही चंद्रपुर महानगर पालिका की नई तस्वीर तय करेगी। चुनाव परिणाम आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि जनता ने बदलाव चुना या फिर पुरानी परंपरा को ही आगे बढ़ाया।
गणेश रहिकवार - संपादक (चंडिका एक्सप्रेस)

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