डमरू नहीं, घुंघरू बजाने की तैयारी में जनता ..!

अबकी बार चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव में बदलेगा सियासी सुर—डमरू नहीं, घुंघरू बजाने की तैयारी में जनता
बल्लारपुर (का.प्र.) :आगामी चंद्रपुर महानगर पालिका चुनाव को लेकर शहर की सियासत में जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। इस बार चुनावी माहौल में “डमरू” नहीं बल्कि “घुंघरू” की गूंज सुनाई देने लगी है। जनता अब सिर्फ वादों से नहीं, बल्कि पिछले कार्यकाल में हुए कार्यों की वास्तविक तुलना के आधार पर अपना फैसला लेने के मूड में दिखाई दे रही है।
पिछले कुछ वर्षों में मूलभूत सुविधाओं, सड़कों, पानी, सफाई, बिजली, रोजगार और शहरी विकास जैसे मुद्दों पर जनता में असंतोष बढ़ा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि भाजपा शासन में किए गए कार्य अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। कई वार्डों में अधूरे विकास कार्य, बढ़ती महंगाई और प्रशासनिक उदासीनता ने जनता को त्रस्त कर दिया है।
इसी असंतोष के चलते इस बार चुनावी रण में भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने की संभावना जताई जा रही है। शहर के विभिन्न हिस्सों में लोग खुलकर यह चर्चा कर रहे हैं कि अब की बार वोट “प्रचार” पर नहीं, बल्कि “परिणाम” पर दिया जाएगा।

राजनीतिक समीकरण भी बदले-बदले नजर आ रहे हैं :

कांग्रेस खेमे में नए-पुराने नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है, वहीं दल बदल कर आए कुछ वरिष्ठ नेता अब घड़ी चिन्ह वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की नोक पर चुनावी रणनीति तैयार करते नजर आ रहे हैं। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और वंचित बहुजन आघाड़ी भी अपनी-अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने में जुटी हुई हैं।
इन सभी दलों के बीच तालमेल, समीकरण और गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार मुकाबला सिर्फ पार्टी चिन्हों का नहीं, बल्कि जनता के धैर्य, भरोसे और उम्मीदों का है।

“एक बोटी–एक रोटी” की राजनीति बनाम विकास का मुद्दा :

शहर में यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि क्या जनता फिर से तात्कालिक लाभ, लालच और चुनावी प्रलोभनों के जाल में फंसेगी, या फिर स्थायी विकास को प्राथमिकता देगी। मतदाताओं के बीच यह बहस तेज है कि वोट की कीमत सिर्फ कुछ रुपयों या सुविधाओं से नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के भविष्य से जुड़ी है।

ईश्वरी संकेत और जनता की भूमिका :

कुछ लोग इसे “ईश्वरी संकेत” भी मान रहे हैं कि अब बदलाव का समय आ गया है। लेकिन असली फैसला तो जनता के हाथ में है। लोकतंत्र में वही तय करेगी कि इस बार शहर की सरकार किस दिशा में जाएगी—विकास की ओर या फिर पुराने तरीकों की ओर।
अब सबकी नजरें चंद्रपुर की जनता पर टिकी हैं।
क्या सच में इस बार “डमरू” की जगह “घुंघरू” बजेंगे? 
क्या त्रस्त जनता बदलाव की राह चुनेगी? 
या फिर वही पुरानी राजनीति दोहराई जाएगी? 
इसका जवाब आने वाले चुनाव परिणामों में मिलेगा।

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