डाॅ. रमेशकुमार एस. बोरकुटे संघर्ष से सफलता तक.!

चंद्रपुर (सय्यद रमजान अली) : 

संघर्ष की शुरुआत :

एक साधारण परिवार में 26 दिसंबर 1975 को जन्मे डाॅ. रमेशकुमार एस. बोरकुटे का जीवन आरंभ से ही संघर्षों से भरा रहा।
गरीबी, जिम्मेदारियाँ और सीमित अवसरों के बीच भी उनके भीतर कुछ कर दिखाने की आग थी जो कि विशेष उल्लेखनीय है।क्योंकि बचपन से ही मेहनत उनके जीवन का अटूट हिस्सा बन चुकी थी।
मात्र 7वीं कक्षा में पढ़ते हुए रमेश बोरकुटे अपनी माँ के साथ कवेलू फैक्ट्री में काम करते थे। दिनभर काम, फिर शाम को पढ़ाई यही उनकी दिनचर्या थी। केवल ₹10 प्रतिदिन मजदूरी में माँ-बेटे की मेहनत से घर चलता था।


उसी संघर्ष में उन्होंने जीवन का सबसे बड़ा सबक सीखा कि “मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती, अगर विश्वास परमेश्वर पर हो।”
धीरे-धीरे वक्त बढ़ा, लेकिन परिस्थितियाँ नहीं बदलीं। 10 वीं के बाद बहन के घर रहते हुए चंद्रपुर में एक STD PCO बूथ पर ₹500 महीने की नौकरी मिली। दिनभर नौकरी और रात में पढ़ाई यही रूटीन बन गया। उसी दौरान उन्होंने नंदा से प्रेम किया, जो आगे चलकर उनकी जीवनसंगिनी बनीं।
12 वी की बोर्ड परीक्षा के आखिरी पेपर के दिन,10 अप्रैल 1995 को, 20 वर्ष से भी कम उम्र में उन्होंने नंदा जी से प्रेम विवाह किया। दोनों ने मिलकर संघर्षों के बीच एक नया जीवन शुरू किया तब ना घर था, ना स्थिर नौकरी, पर विश्वास अटूट था।

प्रेम और जिम्मेदारी:

शादी के बाद दोनों ने मिलकर जीवन को सँवारने का प्रयास शुरू किया। कभी STD बूथ, कभी छोटी दुकान यही आजीविका का आधार था। 17 दिसंबर 1995 को उनके जीवन में पहली खुशी आई बादल, उनके पुत्र के रूप में। और फिर 1998 में एलिजा, उनकी बेटी का जन्म हुआ।लेकिन उस खुशी के साथ कई कठिनाइयाँ का भी सामना करना पड़ा। आर्थिक स्थिति खराब थी, रहने को छोटा कमरा था। वरोरा में STD बूथ पर नौकरी करते हुए, उन्होंने अपने ही छोटे कमरे से किराना दुकान शुरू की। जीवन यापन कठिन था, पर उनकी पत्नी हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं।डाॅ. रमेशकुमार कहते हैं: “मेरे जीवन में जो कुछ भी मैंने पाया, वह मेरी पत्नी की प्रार्थना और प्रेम की शक्ति से मिला है।      



असफलता से शिक्षा :

1999 में उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए एक बिल्डिंग मटेरियल सप्लाई व्यवसाय शुरू किया। खेत बेचकर ट्रैक्टर खरीदा — सपनों को आकार देने का प्रयास किया था पर दुर्भाग्यवश, एक करीबी मित्र ने ही धोखा दिया और पूरा व्यापार बर्बाद हो गया। इस हादसे ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया, फिरभी उन्होंने हार नहीं मानी।
वो आंध्रप्रदेश चले गए और करीमनगर में Viroka Force Company में सुपरवाइज़र की नौकरी की। वहीं से उन्होंने जीवन की दिशा दोबारा तय की “अब मैं किसी का कर्मचारी नहीं, मालिक बनूंगा।”ऐसा संकल्प किया।


विश्वास की शक्ति :

डाॅ. रमेशकुमार का जीवन हमेशा परमेश्वर के वचनों से प्रेरित रहा है। नौकरी के साथ-साथ वे हर रात प्रार्थना करते “हे यहोवा, मुझे मालिक बना ताकि मैं दूसरों को रोजगार दे सकूं।” 2006 में परमेश्वर ने उनकी सुन ली।मिशन इंडिया संस्था के माध्यम से सामाजिक कार्य का अवसर मिला। सिर्फ ₹2000 मानधन पर, परिवार सहित आर्वी (जिला वर्धा) में जाकर सेवा शुरू की। एक पुरानी साइकिल पर रोज़ 25 किमी का सफर कर, लोगों की मदद करना, प्रचार करना, यही उनका मिशन बन गया था।रहने को किराए का छोटा कमरा, ₹900 किराया और ₹1100 में पूरा परिवार का खर्च। लेकिन हिम्मत कभी नहीं टूटी।
वे कहते हैं : “जिनके पास परमेश्वर का विश्वास है, उनके लिए कोई गरीबी स्थायी नहीं होती।”


यहोवा यिरे का दर्शन :

2010 में उन्होंने HDFC Life Insurance से जुड़कर बैंकिंग क्षेत्र में कदम रखा। धीरे-धीरे अनुभव और आशीष दोनों बढ़ते गए। पत्नी ने सिलाई - कढ़ाई का कार्य किया, दोनों मिलकर जीवन संभालते रहे।2014 में परमेश्वर ने उनके परिवार को बड़ी आशीष दी उनकी पत्नी को थर्मल पॉवर स्टेशन चंद्रपुर में सरकारी नौकरी मिली।


डाॅ. रमेशकुमार भी चंद्रपुर आ गए और HDFC Housing Loan Department में कार्य करने लगे। 2016 में दोनों ने मिलकर “बुटीक और कपड़ों की दुकान” खोली। जीवन अब स्थिर होने लगा था। पर एक बार फिर, 2018 में दोस्तों ने फिर से धोखा दिया लेकिन इस बार उन्होंने रोने के बजाय प्रार्थना की।
प्रार्थना में परमेश्वर ने उनसे कहा: “मैं तुझे आशीष दूँगा, तेरा नाम महान करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा।”(उत्पत्ति 12:2) और वहीं से यहोवा यिरे बैंक का सपना शुरू हुआ ।

पहली सफलता की सीढ़ी :

2019 में उन्होंने “यहोवा यिरे बचत निधी लिमिटेड” की स्थापना की। अपने ही प्लॉट पर एक कर्मचारी से शुरू हुआ यह कार्य आज 451 कर्मचारियों और 45 शाखाओं के साथ हजारों लोगों का सहारा बन गया।2023 में, अपने जन्मदिन पर, “यहोवा यिरे अर्बन क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड” का लाइसेंस प्राप्त हुआ।यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।


समाजसेवा का समर्पण :

2022 में उन्होंने अपनी बेटी एलिजा के साथ “यहोवा यिरे फाउंडेशन” की स्थापना की एक NGO जो शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और रोजगार पर कार्य करती है।रक्तदान शिविर, वृक्षारोपण अभियान, हेल्थ चेकअप कैम्प, रोजगार मेले, और महिला सशक्तिकरण जैसे अनेक कार्यक्रमों से हजारों लोगों का जीवन में भी बदलाव आया।क्योंकि रमेशकुमार कथनी से अधिक करनी को प्राथमिकता देते है।


सम्मान और पहचान :

बहुआयामी व्यक्तिमत्व के धनी डाॅ. रमेशकुमार के योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक पुरस्कार मिले और उन्हें सम्मानित भी किया गया।उन्हें 
🏅 देश रत्न पुरस्कार
🏅 महाराष्ट्र रत्न पुरस्कार
🏅 विदर्भ रत्न पुरस्कार
🏅 बेस्ट NGO अवॉर्ड सह अनेक पुरस्कार मिले है ।
साथ ही वे निम्न पदों पर सेवारत भी हैं: सत्यवेध न्यूज लाइव के मुख्य संपादक, पर्यावरण संवर्धन एवं विकास समिति महाराष्ट्र के कार्याध्यक्ष,सोशल पत्रकार वेल्फेयर मीडिया ट्रस्ट के राज्य अध्यक्ष, इंटरनॅशनल वुमन राइट एंड क्राइम कंट्रोल काउंसिल के आयुक्त, मिशन इंडिया संस्था के वर्धा जिला कोऑर्डिनेटर भी है।

उद्योग मूवी और भविष्य का सपना :

डाॅ. रमेशकुमार ने फ़िल्म निर्देशक आलोक शर्मा के साथ मिलकर “उद्योग मूवी” बनाई जिसका उद्देश्य है भारत में बेरोज़गारी को मिटाना और युवाओं को उद्यमिता की ओर प्रेरित करना। यह फ़िल्म 26 दिसंबर 2025 को उनके जन्मदिन पर रिलीज होगी।
उनका सपना है कि “2030 तक यहोवा यिरे बैंक को भारत का अग्रणी को-ऑपरेटिव बैंक बनाना और कम से कम 1000 लोगों को रोजगार देना।”

प्रेरणा और दर्शन :

डाॅ. रमेशकुमार इनका जीवन केवल सफलता की कहानी नहीं, बल्कि परमेश्वर पर विश्वास, परिवार के प्रेम और समाज के प्रति समर्पण की जीती जागती मिसाल है। “जिन्होंने कठिनाइयों में हिम्मत नहीं हारी, वही दूसरों के लिए आशा का दीपक बनते हैं।”
डाॅ. रमेशकुमार एस. बोरकुटे कहते है कि सफलता मेहनत से नहीं, निरंतरता से आती है। गरीबी एक स्थिति नहीं, बल्कि एक परीक्षा है।अगर तुम्हारे पास विश्वास है, तो असंभव भी संभव है। जीवन में हार नहीं, अनुभव मिलता है। परिवार की प्रार्थना सबसे बड़ी पूंजी है। दूसरों को रोजगार देना ही सच्ची सेवा है। परमेश्वर देर करता है, पर अंधेर नहीं। सफलता केवल दिशा बदलती है, मंज़िल नहीं। सीखिए, कमाइए और प्रगति कीजिए। सच्चा नेता वही जो दूसरों को आगे बढ़ाए। जब तक सपने देखना बंद नहीं करते, तब तक हार नहीं होती। मेहनत और प्रार्थना यही सफलता की दो चाबियाँ हैं। जो दूसरों के लिए रोशनी बनता है, उसका जीवन कभी अंधकारमय नहीं होता। भगवान भरोसे रहो, लेकिन कर्म करते रहो। संघर्ष ही वो आग है जो सोने को शुद्ध बनाती है। समाजसेवा ही सबसे ऊँचा धर्म है।असली अमीरी दान करने में है। भरोसा रखो, बदलाव आएगा। अगर दिशा सही हो तो मंज़िल खुद पास आती है। हर गिरावट अगले उठान की तैयारी होती है। अपने सपनों को लिखो, ताकि वो याद रहें। जीवन में विनम्र रहना सबसे बड़ी ताकत है। जो दूसरों को प्रेरणा देता है, वही सच्चा विजेता है। सफलता की राह में विश्वास सबसे बड़ा साथी है। आपका साथ, सबका विकास।

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